News – Article on Philately – Dainik Jagran

News – Article on Philately – Dainik Jagran

An article on Philately in Delhi Edition of  leading Hindi Newspaper Dainik Jagran has been published in its Edition dated 28 Nov 2009. Our readers will appreciate the efforts being put in to Popularise the hobby among the People of all age groups and all walks of life.

A link is given below for the benefit of our readers.

http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=2&edition=2009-11-28&pageno=20

जुनून से बना डाक टिकटों का अनमोल संग्रह
रणविजय सिंह, पश्चिमी दिल्ली हीरे की पहचान जौहरी ही कर सकता है यह कहावत यू हीं नहीं कही जाती। जिस डाक टिकट का इस्तेमाल करने के बाद कागज का टुकड़ा समझकर लोग फेंक देते हैं। देश के इतिहास, संस्कृति की झलक प्रस्तुत करने वाले डाक टिकटों को सहेजना लोग उचित नहीं समझते। हकीकत में यह सस्ता होकर भी अनमोल है। यह बात डाक टिकटों का संग्रह करने का शौक रखने वाले राजौरी गार्डन के चार डाक टिकट संग्रहकर्ताओं से बेहतर कोई नहीं बता सकता। उन्होंने सदी पुराने, स्वतंत्रता के दिनों व दशकों पुराने डाक टिकटों का संग्रह किया है। पुराने दिनों में आने व रुपयों में बिकने वाले डाक टिकटों की कीमत हजारों व लाखों में हो चुकी है। डाक टिकटों पर प्रकाशित पुस्तक स्टेनले गिवन भी इस बात की तस्दीक करती है। दरअसल राजौरी गार्डनवासी विनोद सब्बरवाल, एएस बंगा व अन्य दो दोस्तों ने वर्षो पहले डाक टिकट शौकिया तौर पर संग्रह करना शुरू किया। बाद में ये डाक टिकट संग्रहकत्र्ता बन गए। उन्होंने बाकायदा पश्चिमी दिल्ली फिलाटेलिक क्लब बना लिया है। उन्होंने देश की स्वतंत्रता से पहले, स्वतंत्रता के बाद की डाक टिकट संजोकर रखे हैं, जो भारतीय इतिहास के अतीत के पन्नों को झकझोर कर रख देते हैं। जिसे देखकर सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि तब देश में रहन-सहन कैसी थी, यातायात के साधन क्या थे? देश की आजादी के बाद भारत सरकार ने 30 जनवरी, 1948 को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी पर चार डाक टिकटों का एक सेट जारी किया था। उस वक्त ये टिकट क्रमश: डेढ़ आना, साढ़े तीन आना, 12 आना व दस रुपये में मिलता था। बकौल एस बंगा यह देश का पहला व एक मात्र डाक टिकट है, जो विदेश में छपा। इसे स्विटजरलैंड में छपवाया गया था। उन्होंने बताया कि आज 10 से 12 रुपये में टिकट को खरीदने को अनेक लोग तैयार हैं। बावजूद इसके बापू का यह डाक टिकट नहीं मिल रहा है। यही नहीं, देश स्वतंत्र होने के बाद जारी पहले डाक टिकट जयहिंद, अशोक स्तंभ, तिरंगा झंडा व उड़ान भरते विमान पर स्टांप जारी हुआ था। इस टिकट का भी संग्रह है, जो देश की आजादी की आज भी याद दिलाते हैं। वहीं, डाक टिकट संग्रहकर्ताओं को रोजी रोटी भी दे रहे हैं। पश्चिमी दिल्ली डाक टिकट संग्रह क्लब के अध्यक्ष विनोद सब्बरवाल व एएस बंगा ने बताया कि 1852 में पहला टिकट जारी हुआ था। तब आधा आना में बिकने वाला डाक टिकट की कीमत 50 हजार से लेकर नौ लाख रुपये हो चुकी है। इस अनोखे कार्य के लिए तीन मेडल जीत चुके विनोद सब्बरवाल ने कहा कि जिन डाक टिकटों की छपाई में खामियां होती हैं, उनकी कीमत और ऊंची होती है। यदि खामियां रंगों की हो तो एक टिकट की कीमत पांच लाख रुपये मिल जाता है। डाक टिकट संग्रह करने के शौकीन लोग कटे फटे व बीच से मुड़े हुए टिकट के लिए 40 हजार रुपये तक देने को तैयार रहते हैं क्योंकि इन टिकटों में देश की आत्मा बसती है।